बहुत दिनों के बाद..
आज आई है ये रात जो बिलकुल तन्हा है..
आज बस मैं हूँ और ये अँधेरा है मेरे साथ..
बाहों में भर के मुझे बैठा है..
हंस दूँ तो संग मुस्कुराता है..
रो दूँ.. तो साथ आंसू बहाता है..
जागूं तो आँखें खोले ताकता है..
सो जाऊं, तो आँखों में गुम हो जाता है..
पर फिर भी हर बार तुम्हारी ही याद दिलाता है..
हवा की छुअन तुम्हारे स्पर्श सी लगती है..
कोई चुपके से आकर बालों को सुलझाता है..
ठीक तुम्हारी ही तरह..
मेरी खिलखिलाहट पर साथ मेरे कोई हँसता है..
फिर अचानक जाने कहाँ गुम हो जाता है..
सच ही कहा था तुमने..
आदत न डालूं तुम्हारी..
अब तो खुद को देखूं तो भी तुम्हारा ही अक्स नज़र आता है..
सब बातों को सोचूं
और हालातों को तौलूं
तो मन मेरा बहुत अकेला पड़ जाता है..
और ऐसे में जब तुम मेरे पास नहीं होते
तो यही अँधेरा मेरा साथ निभाता है..
तुम पूछा करते हो अक्सर मेरी उलझन का सबब..
बस यही सोचती हूँ..
गर तुम ना हो तो ज़िन्दगी में अँधेरे के सिवा क्या रह जाता है?

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