
मन आवारा है ये तो हमेशा से ही सुनती आई हूँ और महसूस भी किया है...
जब इसे खुला छोड़ कर आँखें मूँद लो तो दूर कहीं खुले आकाश में उड़ने लगता है और सोचो की बाँध कर रख लिया जाये, तो पंख समेत कर बैठ जाता है और न जाने कहाँ कहाँ के सपने बुनने लगता है..
कभी यूँ ही छोटे एक बच्चे की तरह खिलखिला कर हंस पड़ता है तो कभी एक ज़माने से भरा बैठा हो, इस तरह रो देता है..
कभी इसे रात के अँधेरे में भी चैन नहीं मिलता, तो कभी दिन के उजाले में भी गुमसुम रहता है...
कभी सारी दुनिया का मीत बन जाता है, तो कभी अपनों से ही रूठ कर बैठ जाता है..
इसे समझ पाना शायद सबसे टेढ़ा काम है..
इसकी फितरत ही कुछ उलझी हुई सी है..
कहते हैं की आप तभी सफल हो पाते हैं जब अपने मन को काबू कर लें. लेकिन अगर एक तितली के पंखों से सारे रंग ही निचोड़ लिए जायें तो उसकी खूबसूरती कहाँ रह जाएगी?
अगर मन को बाँध लिया जाये रोक क रख लिया जाये तो क्या ये ज़िन्दगी उतनी मजेदार रह पायेगी जितनी आज है?
इसलिए ख्यालों के इस पंछी को उड़ने दीजिये और इन पंखों को थोड़ी हवा लगने दीजिये..
ये दरिया अपनी राह तभी बना पायेगा जब इसे आज़ाद छोड़ दिया जाये...
मन को उड़ने दीजिये रोकिये मत!!

मन के मत पे मत चलियो रे जीते जी मरवा देगा!!!
ReplyDeleteलेकिन फिर भी मन की सुनने का ही मन करता है हमेशा! :-)
विचार अच्छे हैं कि उड़ने दो विचारों को ही!