Monday, January 10, 2011

ek bhooli hui raah..

जीना है एक बार वही पल कल जो हाथ से छूटा था,
एक नन्हा सा सपना जो आँखों से गिर कर टूटा था..
छूना है फिर वो आकाश जो दूर कहीं पर देखा था,
जिसकी ओर ज़ोर से एक छोटा सा पत्थर फेंका था..
भूले बैठे थे अब तक जो राह उसी पर चलना है,
लाखों बार अभी तो मुझको गिरना और संभलना है..
राह-ऐ-गुज़र पे एक बार फिर आपका इस्तकबाल.. कुछ दिन के लिए ज़रा इस तरफ आना जाना बंद था.
न पांव चलते थे.. न दिमाग साथ देता था.. पर एक बार फिर यहाँ चलने की जुर्रत की है.. उम्मीद है इस बार इस राह से दामन नहीं छूटेगा...
कल फिर मुलाकात होगी..
शब्बा खैर...


1 comment:

  1. फिर से इस राह पर आने पर साधुवाद!
    कुछ राहों पर हमेशा चलते रहना चाहिए। बने रहो!

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