महिला दिवस चला गया और १४ सालों से जिस बिल के पारित होने की आस सरे देश की महिलाएं लगाये बैठी थी वो महिला आरक्षण बिल भी राज्य सभा में १८६ में से १८५ वोटों के साथ पारित हो गया. दुनिया भर के विरोध और बदतमीज़ी संसद में दिखाई दी. यहाँ तक की एक विरोधी सांसद ने ये तक कह डाला की वह इस बिल के विरोध में कोई भी हद पार करने को तैयार है. पर इतना सब आखिर किस लिए?
वह महिला जिसे नारायणी माना जाता है, जो बिना किसी मांग जांच के अपना सारा जीवन अपने पिता तथा पति के परिवारों के लिए न्योछावर कर देती है, जो साक्षात शक्ति का प्रतीक है, उसे कमज़ोर बता कर आरक्षित करने के लिए?
माफ़ कीजियेगा शायद आप सोचें की ये एक सर्व सुविधा सम्पन्न युवती की वाणी है पर वास्तव में ये हर उस स्त्री की आवाज़ है जो खुद के स्त्री होने पर गर्व करती है. मुझे किसी आरक्षण की ज़रूरत नहीं है. मुझमे इतना माद्दा है की मैं अपने दम पर उस संसद की अध्यक्षता कर सकूँ जिसकी सांसद बनने के लिए मुझे १५ सालों तक तरह तरह की कठिनाइयाँ एवं विरोध सहने पड़े. मैं नहीं चाहती कि लालू यादव जैसे उन पुरुषों को बल मिले जो अपनी जगह अपनी अर्धांगिनी को सत्ता पर कठपुतली बना के काबिज़ कर दें और सुख भोगें.
मुझे मात्र इतना चाहिए कि अपनी रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में जो सुविधा मैं पाती हूँ वोही मेरे जैसी उन असंख्य महिलाओं को मलें जो इस सब का मतलब भी नहीं जानती. संसद में आने से पहले उनकी खुद कि एक समझ विकसित हो और जब वो आवाज़ उठाएं टॉम वो खुद उनकी आवाज़ हो ना कि उनके पति, पिता अथवा पुत्र की.
दो लाइनों में मात्र इतना कि मुझे आप खली बुनियाद दें उसपर कैसे और क्या महेल बनाने हैं वो मुझे आता है.
धन्यवाद
