Monday, March 28, 2011

:)


आदत नहीं थी मुझे कभी ख्वाब देखने की,
पर हर रात तुमसे ऐसे मिलकर अच्छा लगता है..
यूँ तो सोचना किसी बात पे बेवजह गवारा नहीं,
पर तुम्हें सोचना अच्छा लगता है..
बीते लम्हे अब तो कभी याद ही नहीं आते थे,
पर बैठे बैठे अचानक तुम्हारा याद आना अच्छा लगता है..
खोई नहीं ऐसे ही कभी सुध बुध अपनी,
पर तुम्हें सोच कर सब कुछ भुलाना अच्छा लगता है..
खो बैठे थे दुनिया की भीड़ मैं अपने आप को,
पर तुम्हारे साथ खुद को पाना अच्छा लगता है..
कहते थे सभी बहुत समझ है दुनियादारी की हमें,
पर कभी कभी अच्छा बुरा सब भूल जाना अच्छा लगता है..
अपने ही अश्कों से नफरत थी हमें,
पर कभी तुम्हें याद करके एक आंसू बहाना अच्छा लगता है..
तुम्हारी बाहों में गुज़रे वो चंद सुकून के पल,
वो यूँ ही तुम्हें देखते जाना अच्छा लगता है..
हाँ मंज़ूर नहीं होगा तुमसे मेरा यूँ मिलना सभी को,
पर छुपते छुपाते यूँ तुमसे मिलने आना अच्छा लगता है..
क्यों मुमकिन नहीं हमेशा के लिए तुम्हारे साथ रह जाना,
कि हर घड़ी में तुम्हारा साथ निभाना अच्छा लगता है..
क्यों न चाहूँ मैं जीवन भर साथ निभाना,
 जब कुछ पल का ये जीवन अच्छा लगता है..