आज न मेरे पास कहने को कोई कविता है, न सुनाने को कोई ग़ज़ल
न बेहद खूबसूरत शब्द हैं, और न ही दिल छू जाने वाली भावनाएं
सिर्फ एक चीज़ है...
सवाल..
ढेर सारे सवाल..
खुद से, दुनिया से, अपनों से, दोस्तों से, माँ से, पापा से, सभी से..
शुरू कहाँ से करूँ समझ नहीं आता
बस हाथ चल रहे हैं और लिखावट बनती जा रही है..
चलो पहला सवाल खुद से ही
बहुत गुरूर था मुझे कि लोगों को एक नज़र भर में पहचान लेती हूँ
क्यों आज खुद को देखने पर भी परायापन सा लगता है?
सामने वाले कि आँखें पढ़ के उसके दिल का हाल समझ लेती हूँ
क्यूँ ये समझ नहीं पाती कि मेरा अपना मन क्या चाहता है?
दूसरा सवाल अपनी माँ से..
कहते हैं कि दूर विदेश में बैठे बच्चे को चोट लगे तो पहले माँ का दिल दुखता है,
पर तुम्हें क्यों मेरी आँखों का दर्द, मेरी तड़प दिखाई नहीं देती?
क्यों तुम कभी यूँही हाथ बढ़ा कर मेरे सर पे नहीं फेर देती?
तीसरा सवाल पापा से
हर पिता के अपने बच्चों को लेकर कुछ अरमान होते हैं कुछ सपने होते हैं,
अगर कभी गलती से मैं राह भटक गयी और आपके सपनों को पूरा नहीं कर पायी तो क्या आप मुझे माफ़ कर दोगे? और रोज़ ही कि तरह प्यार से गाल पर चपत लगाकर सीधे रास्ते पर मुझे लौटा लाओगे?
चौथा सवाल तुमसे
क्या तुम्हारी बेरुखी कि वजह ये है कि मैंने तुम्हे चाहा?
क्यों आज इतना वक़्त नहीं है तुम्हारे पास कि मेरे सर पर हाथ फेर कर मेरे साथ दो पल मुस्कुरा सको?
क्यों तुम्हें मेरे गलती करने पर गुस्सा नहीं आता?
क्यों मैं चाह कर भी आज तुम्हारा हाथ थाम पाने कि हिम्मत नहीं जुटा पाती?
क्यों बेवजह ये जताते हो कि मैं तुम्हारे लिए कोई मायने नहीं रखती?
और अब बारी है मेरे दोस्तों कि
कहते हैं दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जिसे हम खुद ही बनाते हैं और खुद ही निभाते हैं,
क्यों आज इस रिश्ते में इतनी दूरी हो गयी कि तुम कान खींच कर मुझसे सवाल नहीं करते?
क्यों गालियाँ देकर मुझे मिलने को नहीं कहते?
क्यों अपनी नाराजगी को अपनी हंसी में छुपा लेते हो?
क्यों इतना पराया कर दिया है मुझे कि तुमसे तुम्हारी परेशानी की वजह मुझे पूछनी पड़ती है?
कहाँ गया वो सब जो पहले था और इतना खूबसूरत था?
क्या सब मैंने अपने ही हाथों खो दिया?
कभी किसी रिश्ते की कद्र ही नहीं की?
किसी कि भी उम्मीदों पे खरी नहीं उतर पाई?
या वो सब सिर्फ एक भ्रम था?
सिर्फ एक भ्रम???

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